सुशांत सिंह राजपूत केस ने शिवसेना की राजनीति को बुरी तरह प्रभावित किया।
– फोटो : अमर उजाला

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महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे के बेटे आदित्य ठाकरे के बिहार दौरे ने दिवंगत अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत के प्रशंसकों को जोर का झटका दिया है। SSR वारियर्स ने सामने आकर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की आदित्य ठाकरे से मुलाकात पर कहा है कि जांच के लिए गई बिहार पुलिस के प्रति उद्धव ठाकरे सरकार का व्यवहार भूलने वाला नहीं था और हम सुशांत को न भूले हैं, न भूलने देंगे। ऐसे में ‘अमर उजाला’ ने बिहार की राजनीति में शिवसेना और शिवसेना की राजनीति पर सुशांत सिंह राजपूत केस के प्रभाव की पूरी पड़ताल की। यह पड़ताल एक पंक्ति में यह कहती है कि उत्तर भारतीय के खिलाफ महाराष्ट्र में होने वाली हिंसा के बावजूद बिहार में वजूद कायम रखने वाली शिवसेना को सुशांत सिंह राजपूत केस ने कहीं का नहीं छोड़ा था। पूरी पड़ताल पढ़ें-

2015 में 73 सीटों पर शिवसेना को 2,11,136 वोट मिले थे
महाराष्ट्र में बिहार समेत उत्तर भारत के लोगों के प्रति दुर्व्यवहार और हिंसा की घटनाओं पर बिहार के राजनेता एक समय शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे और उनके साथ भारतीय जनता पार्टी को घेरती थी। बाल ठाकरे के बाद महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) प्रमुख राज ठाकरे को लेकर भी जमकर राजनीति हुई, लेकिन उद्धव ठाकरे को लेकर नाराजगी कभी नहीं घटी। नाराजगी दिखाने वालों में राष्ट्रीय जनता दल अध्यक्ष लालू प्रसाद सबसे आगे रहे। उन्होंने महाराष्ट्र में बिहारियों के खिलाफ दुर्व्यवहार और हिंसा पर दिल्ली तक आवाज उठाई। नतीजा यह रहा कि बिहार में कभी भी शिवसेना मजबूती से नहीं उभर सकी। हालांकि, इसके बावजूद हिंदुत्व के नाम पर वोटरों के बीच शिवसेना की ठीकठाक उपस्थिति थी। 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव में शिवसेना ने 243 में से 73 सीटों पर प्रत्याशी दिए थे। कोई प्रत्याशी जमानत बचाने में कामयाब भले नहीं हुआ हो, लेकिन बिहार में 2,11,136 मतदाताओं ने उसके प्रत्याशियों के पक्ष में वोट जरूर किया था। जिन सीटों पर प्रत्याशी उतरे थे, उनमें औसतन 1.84% वोटर ने साथ दिया था। बिहार के कुल वोटरों के 0.55% ने 2015 के विधानसभा चुनाव में शिवसेना के पक्ष में मतदान किया था।

2020 में सुशांत सिंह राजपूत केस ने सब बदल डाला
कोरोना महामारी में बिहारियों की महाराष्ट्र से वापसी में हो रही परेशानियों के बीच जून 2020 में जब अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की संदिग्ध मौत हुई तो शिवसेना को लेकर नाराजगी बढ़ती गई। वजह यह थी कि बिहारियों की भावनाओं को समझते हुए मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने बिहारी मूल के अभिनेता की हत्या की जांच को समझने के लिए यहां से टीम भेजी तो उसे पहले क्वारेंटाइन करा दिया गया और फिर जांच से दूर कर दिया गया। महाराष्ट्र की उद्धव ठाकरे सरकार ने कहा कि बिहार पुलिस को इस केस में दखल का अधिकार नहीं है। इस केस के कारण उद्धव और नीतीश सरकार में ऐसी ठनी कि अक्टूबर में चुनावी माहौल बनने तक शिवसेना को बिहार में खोजने पर भी प्रत्याशी नहीं मिल रहे थे। जितनी मेहनत उम्मीदवार खोजने में करनी पड़ी, उससे ज्यादा वोट पाने में। 2015 के चुनाव में 73 सीटों पर प्रत्याशी देने वाली शिवसेना को 2020 के चुनाव में महज 22 प्रत्याशियों से संतोष करना पड़ा। इनमें से भी किसी की जमानत नहीं बची। जमानत बचती भी तो कैसे? 2015 में प्रत्याशी वाली प्रति सीट के हिसाब से औसतन जहां उसे 2879 वोट के सहारे 73 सीटों पर कुल वोट 2,11,136 थे, वहीं इस बार 22 सीटों पर औसत 917 वोटों के हिसाब से कुल 20,195 वोट ही मिले। मतलब, प्रति सीट के हिसाब से पिछली बार के मुकाबले वोटों का 70% नुकसान। जहां 2015 में प्रत्याशी वाली सीटों पर 1.84% वोटरों ने साथ दिया था, वहीं 2020 चुनाव में महज 0.53% ने। इस तरह, बिहार के कुल वोटरों के हिसाब से शिवसेना को मिले वोटों का प्रतिशत 0.05 पर उतर आया। अब शिवसेना भी दो टुकड़े में है और उद्धव ठाकरे की शिवसेना महाराष्ट्र में कमजोर होकर सरकार से बाहर है।

SSR वारियर्स शांत नहीं हुआ अबतक, दिखाई नाराजगी
सुशांत सिंह राजपूत की संदिग्ध मौत को SSR वारियर्स हत्या बताती है, जबकि महाराष्ट्र सरकार पहले दिन से इसे सुसाइड साबित करने में लगी है। दो साल से SSR वारियर्स के सदस्यों ने देश-विदेश में वर्चुअल मोड में बहस के जरिए सुशांत सिंह राजूपत केस को जिंदा रखा है। SSR वारियर्स की ऋचा वर्मा ने कहा कि 2020 के चुनाव से 4-5 महीने सुशांत की हत्या हुई थी, तब बिहार के मुख्यमंत्री ने हम बिहारियों की इच्छा समझते हुए इसकी जांच के लिए पहल की थी। जांच के लिए प्रयास करने वाले तत्कालीन डीजीपी गुप्तेश्वर पांडेय के योगदान को हम जितना याद करते हैं, उतना ही मुख्यमंत्री के प्रयासों को भी। लेकिन, जिनपर इस केस को प्रभावित करने का आरोप है, अब उनसे हमारे मुख्यमंत्री का इस तरह मिलना और सम्मानित करना बेहद खेदपूर्ण है। अब इस मुलाकात के खिलाफ भी हम आवाज उठाएंगे, ताकि सुशांत के दोषियों को कभी चैन नहीं मिले। ऋचा के अनुसार, SSR वारियर्स की ओर से मुंबई में रूपल नागदा और पटना से वह खुद सोशल मीडिया पर इस मुलाकात की कड़ी भर्त्सना करेंगी। ऋचा के अनुसार, दिशा सालियान और सुशांत के केस को कुछ खास कारणों से हादसा-सुसाइड में बदला गया है।

 

तेजस्वी से मिलने आए थे ठाकरे, नीतीश से भी मिल गए
बिहार की राजनीति में आदित्य ठाकरे का यह बिहार दौरा अलग बहस छेड़ गया है। योजना यह बताई गई थी कि उद्धव ठाकरे के बेटे और महाराष्ट्र के पूर्व मंत्री आदित्य ठाकरे बिहार में उप मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव से मिलने आ रहे हैं। पटना आने पर आदित्य सीधे तेजस्वी से मिलने पहुंचे भी, लेकिन फिर वह उन्हीं के साथ मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से भी मिलने पहुंच गए। सुशांत सिंह राजपूत केस के समय तेजस्वी यादव ने भी महाराष्ट्र सरकार के रवैए के प्रति नाराजगी दिखाई थी, लेकिन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का स्टैंड बहुत कड़ा था। बिहार सरकार ने साफ कहा था कि बिहार पुलिस इस केस की जांच में भागीदार हो ताकि कोई एंगल नहीं छूटे।

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महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे के बेटे आदित्य ठाकरे के बिहार दौरे ने दिवंगत अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत के प्रशंसकों को जोर का झटका दिया है। SSR वारियर्स ने सामने आकर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की आदित्य ठाकरे से मुलाकात पर कहा है कि जांच के लिए गई बिहार पुलिस के प्रति उद्धव ठाकरे सरकार का व्यवहार भूलने वाला नहीं था और हम सुशांत को न भूले हैं, न भूलने देंगे। ऐसे में ‘अमर उजाला’ ने बिहार की राजनीति में शिवसेना और शिवसेना की राजनीति पर सुशांत सिंह राजपूत केस के प्रभाव की पूरी पड़ताल की। यह पड़ताल एक पंक्ति में यह कहती है कि उत्तर भारतीय के खिलाफ महाराष्ट्र में होने वाली हिंसा के बावजूद बिहार में वजूद कायम रखने वाली शिवसेना को सुशांत सिंह राजपूत केस ने कहीं का नहीं छोड़ा था। पूरी पड़ताल पढ़ें-

2015 में 73 सीटों पर शिवसेना को 2,11,136 वोट मिले थे

महाराष्ट्र में बिहार समेत उत्तर भारत के लोगों के प्रति दुर्व्यवहार और हिंसा की घटनाओं पर बिहार के राजनेता एक समय शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे और उनके साथ भारतीय जनता पार्टी को घेरती थी। बाल ठाकरे के बाद महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) प्रमुख राज ठाकरे को लेकर भी जमकर राजनीति हुई, लेकिन उद्धव ठाकरे को लेकर नाराजगी कभी नहीं घटी। नाराजगी दिखाने वालों में राष्ट्रीय जनता दल अध्यक्ष लालू प्रसाद सबसे आगे रहे। उन्होंने महाराष्ट्र में बिहारियों के खिलाफ दुर्व्यवहार और हिंसा पर दिल्ली तक आवाज उठाई। नतीजा यह रहा कि बिहार में कभी भी शिवसेना मजबूती से नहीं उभर सकी। हालांकि, इसके बावजूद हिंदुत्व के नाम पर वोटरों के बीच शिवसेना की ठीकठाक उपस्थिति थी। 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव में शिवसेना ने 243 में से 73 सीटों पर प्रत्याशी दिए थे। कोई प्रत्याशी जमानत बचाने में कामयाब भले नहीं हुआ हो, लेकिन बिहार में 2,11,136 मतदाताओं ने उसके प्रत्याशियों के पक्ष में वोट जरूर किया था। जिन सीटों पर प्रत्याशी उतरे थे, उनमें औसतन 1.84% वोटर ने साथ दिया था। बिहार के कुल वोटरों के 0.55% ने 2015 के विधानसभा चुनाव में शिवसेना के पक्ष में मतदान किया था।

2020 में सुशांत सिंह राजपूत केस ने सब बदल डाला

कोरोना महामारी में बिहारियों की महाराष्ट्र से वापसी में हो रही परेशानियों के बीच जून 2020 में जब अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की संदिग्ध मौत हुई तो शिवसेना को लेकर नाराजगी बढ़ती गई। वजह यह थी कि बिहारियों की भावनाओं को समझते हुए मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने बिहारी मूल के अभिनेता की हत्या की जांच को समझने के लिए यहां से टीम भेजी तो उसे पहले क्वारेंटाइन करा दिया गया और फिर जांच से दूर कर दिया गया। महाराष्ट्र की उद्धव ठाकरे सरकार ने कहा कि बिहार पुलिस को इस केस में दखल का अधिकार नहीं है। इस केस के कारण उद्धव और नीतीश सरकार में ऐसी ठनी कि अक्टूबर में चुनावी माहौल बनने तक शिवसेना को बिहार में खोजने पर भी प्रत्याशी नहीं मिल रहे थे। जितनी मेहनत उम्मीदवार खोजने में करनी पड़ी, उससे ज्यादा वोट पाने में। 2015 के चुनाव में 73 सीटों पर प्रत्याशी देने वाली शिवसेना को 2020 के चुनाव में महज 22 प्रत्याशियों से संतोष करना पड़ा। इनमें से भी किसी की जमानत नहीं बची। जमानत बचती भी तो कैसे? 2015 में प्रत्याशी वाली प्रति सीट के हिसाब से औसतन जहां उसे 2879 वोट के सहारे 73 सीटों पर कुल वोट 2,11,136 थे, वहीं इस बार 22 सीटों पर औसत 917 वोटों के हिसाब से कुल 20,195 वोट ही मिले। मतलब, प्रति सीट के हिसाब से पिछली बार के मुकाबले वोटों का 70% नुकसान। जहां 2015 में प्रत्याशी वाली सीटों पर 1.84% वोटरों ने साथ दिया था, वहीं 2020 चुनाव में महज 0.53% ने। इस तरह, बिहार के कुल वोटरों के हिसाब से शिवसेना को मिले वोटों का प्रतिशत 0.05 पर उतर आया। अब शिवसेना भी दो टुकड़े में है और उद्धव ठाकरे की शिवसेना महाराष्ट्र में कमजोर होकर सरकार से बाहर है।



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By bihardelegation21

Chandan kumar patel (BA) , I am not social worker I am Social Media Worker.

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