नीतीश कुमार ने उपेंद्र कुशवाहा पर बात करने से भी मना किया।
– फोटो : अमर उजाला

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मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अपनी पार्टी जनता दल यूनाईटेड के संसदीय बोर्ड अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा को लेकर साफ कहा है कि उनके बारे में कोई हमसे नहीं पूछे। नीतीश कुमार ने मंगलवार सुबह जनननायक कर्पूरी ठाकुरी की 99वीं जयंती पर उनके गांव जाने से पहले पटना में आयोजित श्रद्धांजलि सभा के बाद पत्रकारों से बातचीत में कुशवाहा का नाम आते ही कहा- “उनकी किसी बात पर मत पूछिए। वह आजकल कुछ बोल रहे हैं तो जो मर्जी बालें। हमको कोई लेना-देना नहीं।” इसे जदयू में उपेंद्र कुशवाहा के लिए अंतिम कील समझा जा सकता है। मतलब, अब कुछ न कुछ नया समीकरण ही बनेगा। बनेगा तो क्या?

कुशवाहा निकलेंगे तो कूचे से अकेले ही

उपेंद्र कुशवाहा के पास बचा क्या है? सबसे अहम सवाल अभी यही है। उपेंद्र कुशवाहा एक जमाने में नीतीश के बहुत करीब हुआ करते थे। उसमें बाद दोनों में दरार आई, क्योंकि कुशवाहा को खुद में सीएम मैटेरियल नजर आने लगा था। इस दरार के साथ कुशवाहा की नीतीश से दूरी हुई। यह दरार दरअसल कभी भरी ही नहीं, कामचलाऊ कवर लगा था बस। कुशवाहा ने जब केंद्र में मंत्रीपद छोड़ा तो बिहार में नीतीश कुमार के खिलाफ अभियान चला रहे थे। शिक्षा को लेकर हमला कर रहे थे। फिर जब भाजपा-जदयू में दूरी हुई तो कुशवाहा ने अपनी रही-सही पार्टी का विलय जदयू में करा लिया। रही-सही इसलिए, क्योंकि महत्वाकांक्षा की लड़ाई के कारण राष्ट्रीय लोक समता पार्टी (RLSP) पहले ही दो फाड़ हो चुकी थी। रालोसपा का जदयू में विलय होने के बाद कुशवाहा एक तरह से जदयू में अपनी पुरानी पार्टी के इकलौते झंडाबरदार हैं। ऐसा इसलिए कहा जा सकता है, क्योंकि सोमवार को कुशवाहा की नाराजगी को लेकर एक सवाल के जवाब में जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजीव रंजन सिंह उर्फ ललन सिंह ने कहा था कि “उन्होंने (कुशवाहा) अपने जिन लोगों को मुख्य संगठन या प्रकोष्ठों में जहां एडजस्ट करने कहा था, कर दिया गया था।” मतलब, कुशवाहा के बाकी लोग जदयू में ‘सेट’ हैं। उप मुख्यमंत्री बनने का उनका सपना नीतीश खुद तोड़ चुके हैं। अगर कुशवाहा जदयू के कूचे से निकले तो शायद अकेले ही निकलें। 

अकेले किस काम के? कहां जाएंगे

उपेंद्र कुशवाहा की भाजपा नेताओं से एम्स में इलाज के दौरान मुलाकात को लेकर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का यह कहना कि वह पार्टी बदलते रहे हैं, सबसे अहम मोड़ रहा। फिर कुशवाहा ने भी जदयू नेताओं के भाजपा से करीब होने और जदयू के ही बार-बार भाजपा के साथ जाने की बात कहकर नीतीश कुमार को एक तरह से जवाब दे दिया। ऐसे में जदयू छोड़ना उनके राजनीतिक भविष्य पर संकट खड़ा कर देगा। भाजपा को ऐन वक्त पर धोखा दे चुके कुशवाहा अगर उधर जाते भी हैं तो अकेले होने के कारण बहुत भाव मिलने से रहा। अकेले पार्टी खड़ा करना छोटा काम नहीं होगा। एक विकल्प यह है कि उन्हें जदयू में असहज देख वोट बैंक के लिहाज से राजद अपने साथ बुला ले, लेकिन इसके लिए तेजस्वी यादव को भी नीतीश कुमार से बात करनी होगी। मतलब, दरवाजे तो कई हैं लेकिन दिल खोल कर स्वागत करने वाला कोई नहीं। इसलिए अब सब कुशवाहा पर नजर रखेंगे कि वह कूचे से निकलते हैं या अंदर ही इज्जत वापस पाने का प्रयास करते हैं। 



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By bihardelegation21

Chandan kumar patel (BA) , I am not social worker I am Social Media Worker.

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