पटना4 घंटे पहले

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AQI 300; फेफड़े खराब करने को काफी, फिर भी दौड़ रहे डीजल ऑटो; बिना ढके निर्माण

ठंड बढ़ने पर हवा में संकुचन होता है। वह वायुमंडल में नीचे की ओर आती है। जब मशीन वायु प्रदूषण के स्तर को मापती है तो धूल कण की मात्रा बढ़ी मिलती है। लेकिन, सबसे बड़ा सवाल यह है कि इतना धूल कण हमेशा हवा में आता कहां से हैं, जिससे कि ठंड बढ़ते ही एक्यूआई (एयर क्वालिटी इंडेक्स) लेवल जानलेवा बन जाता है? इसी सवाल का जवाब ढूंढने के लिए दैनिक भास्कर ने तीन एक्सपर्ट का पैनल बनाया। एनआईटी पटना के सिविल डिपार्टमेंट के प्रोफेसर, पर्यावरण पर काम करने वाली संस्था ग्रीनपीस के कैंपेनर और एक पर्यावरण विशेषज्ञ इसमें शामिल थे।

टीम ने पटना के बढ़े एक्यूआई के कारणों को जानने के लिए विभिन्न इलाकों का दौरा किया और पाया कि अलग-अलग इलाकों में बढ़े एक्यूआई लेवल का कारण भी भिन्न-भिन्न है। वायु प्रदूषण के कारण सेहत पर पड़ने वाले असर के बारे में डॉक्टरों से भी बात की गई। उन्होंने बताया कि AQI 300 से अधिक है तो यह फेफड़े खराब करने को काफी है।

प्रदूषण की 3 वजह |
1. रेंगता ट्रैफिक

2. खुले में निर्माण

3. घटती हरियाली

1. हाईकोर्ट से पटेल भवन तक
वजह: पेड़ काटे, निर्माण कार्य बिना ढके जारी हैं

हड़ताली मोड़ पर लोहिया पथ चक्र फेज दो के निर्माण के कारण यहां ट्रैफिक स्लो है। मेट्रो का भी काम चल रहा है। एनवायरनमेंटल प्रोटेक्शन के लिए घेराबंदी नहीं है। एनजीटी के नियमों के अनुसार यहां ग्रीन नेट 40-50 फीट की ऊंचाई पर घिरी होनी चाहिए। हालांकि यहां नगर निगम के विशेष वाहन से दो-तीन घंटे पर पानी फव्वारा मारा जाता दिखा।

2. कोतवाली से डाकबंगला तक
वजह: स्लो ट्रैफिक, लंबा जाम व कार्बन एमिशन

यहां हेवी और स्लो ट्रैफिक एक्यूआई लेवल बढ़ने का बड़ा कारण है। तारामंडल से डाकबंगला के बीच में तीन ट्रैफिक लाइट है, लगभग दो से तीन मिनट के लिए रेड हो जाती है। गाड़ियां रुकती हैं। 80 फीसदी का इंजन चालू रहता है। चूंकि सड़क की चौड़ाई भी अपेक्षाकृत कम है, इसलिए वाहनों की लंबी कतार लगती है और एक्यूआई लेवल अपने आप बढ़ जाता है।

3. बापू सभगाार से एनआईटी तक
वजह : निर्माण के लिए सड़क खोदी, घेराबंदी नहीं

चिल्ड्रेन पार्क से एनआईटी मोड़ के बीच मेट्रो और डबल डेकर सड़क का निर्माण चल रहा है। सड़क की खुदाई हुई है। खुदाई के दौरान निकलने वाले धूल-गर्दे को कम करने के लिए पानी छिड़का जाता है। पर ग्रीन नेट से ऊंचाई तक घेराबंदी नहीं है। वेस्ट मैटेरियल ढका नहीं। निर्माण कार्य के वेस्ट मटेरियल की बिना ढंके ढुलाई होते देखी जा सकती है।

AQI 300 से अधिक है, तो इससे दमा, खुजली, एलर्जी बढ़ेगी। प्रदूषित वातावरण में सांस लेने से फेफड़ा खराब हो सकता है। 20-30% मस्तिष्क, तंत्रिका, हृदय आदि मरीजों की संख्या बढ़ सकती है। गर्भस्थ शिशु के विकास पर भी प्रभाव पड़ता है। -डॉ. राजीव रंजन, डॉ. दिवाकर तेजस्वी

प्रदूषण नियंत्रण का काम स्टेक होल्डरों का
शहर में एयर पॉल्यूशन काे नियंत्रित रखने के लिए नगर निगम अपने हिस्से का काम कर रहा है। लेकिन परिवहन, भवन, सड़क एवं पुल निर्माण के साथ पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड को मिलकर इस दिशा में काम करने की जरूरत है। नियमों की अनदेखी करने वालों पर जुर्माना भी किया जाता है।
शीला ईरानी, अतिरिक्त नगर आयुक्त, पटना नगर निगम

2030 तक मानक बदलेंगे, स्थिति नहीं
हवा को जहरीली बनाने वाले कई और फैक्टर

फैक्टर 2022 2030 ट्रांसपोर्ट 19% 25% घरेलू ईंधन 22% 16% इंडस्ट्री 14% 15% डीजी सेट 5% 5% ईंट भट्टे 14% 11% वेस्ट बर्निंग 11% 12% कंस्ट्रक्शन 15% 16%

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By bihardelegation21

Chandan kumar patel (BA) , I am not social worker I am Social Media Worker.

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