बगहा (वाल्मिकीनगर)10 मिनट पहले

इस मछली के मिलने के बाद पर्यावरण से जुड़े लोग इलाके के इकोसिस्टम को लेकर चिंता जता रहे हैं।

वाराणसी के बाद अब बगहा में सकरमाउथ कैटफिश मछली मिली है। इसने लोगों को हैरत में डाल दिया है। इस अजीबोगरीब मछली को आज बुधवार की सुबह बनचहरी गांव के पास हरहा नदी में देखा गया। मछली पकड़ने के दौरान यह मछुआरे के जाल में फंस गई। जानकारी मिलते ही इसे देखने के लिए लोगों का तांता लग गया।

हैरान करने वाली बात ये है कि आमतौर पर यह मछली हजारों किलोमीटर दूर दक्षिण अमेरिका की अमेजन नदी में पाई जाती है। हालांकि बीते दो सालों में इसे वाराणसी में गंगा नदी में भी देखा गया है। एक्सपर्ट्स के अनुसार इस मछली का यहां मिलना नदी के इकोसिस्टम के लिए भी चिंताजनक है।

अजीब से मुंह वाली इस मछली को देखने दूर-दूर से लोग आ रहे हैं।

पर्यावरण से जुड़े लोग जता रहे हैं चिंता
बगहा के वाल्मिकी टाइगर रिजर्व के साथ वाइल्डलाइफ ट्रस्ट ऑफ इंडिया (WTI) और वर्ल्ड वाइल्डलाइफ फंड (WWF) नाम की संस्थाएं काम कर रही हैं। इनके साथ काम कर रहे लोग भी इस मछली को देखकर हैरत में हैं। WWF के एरिया कोऑर्डिनेटर कमलेश मौर्या ने बताया कि यह चिंता का विषय है। चंपारण की नदियों के लिए यह खतरनाक है। क्योंकि यह मांसाहारी मछली है।

वहीं WTI के सुब्रत लेहरा ने चिंता जाहिर करते हुए कहा कि यह मछली मांसाहारी है और अपने इकोसिस्टम के लिए खतरा भी है। उन्होंने कहा कि यह स्थानीय नदियों के इकोसिस्टम का विनाश कर सकती है। यह आसपास के जीव-जंतुओं को खाकर जिंदा रहती है। इस वजह से यह किसी महत्वपूर्ण मछली या जीव को पनपने नहीं देती है।

बड़ा सवाल – हजारों किलोमीटर दूर की मछली पहुंची कैसे
अब लोगों के अंदर सवाल उठ रहा है कि आखिर हजारों किलोमीटर दूर पाई जाने वाली यह मछली बिहार कैसे पहुंच गई। इस बारे में WWF के कमलेश मौर्या कहते हैं कि इसकी अलग पहचान के चलते कई लोग इसे एक्वेरियम में पालते हैं। हालांकि एक्यूरम में यह काफी छोटी होती है। जबकि नदी में इसका आकार बढ़ गया है। हो सकता है कि किसी ने एक्वेरियम से इसे नदी में छोड़ा हो और यहां इसका आकार धीरे-धीरे बढ़ गया हो।

इस मछली के मिलने के बाद पर्यावरण से जुड़े लोग इलाके के इकोसिस्टम को लेकर चिंता जता रहे हैं।

इस मछली के मिलने के बाद पर्यावरण से जुड़े लोग इलाके के इकोसिस्टम को लेकर चिंता जता रहे हैं।

एक साल पहले भागलपुर में गंगा नदी में मिल चुकी है
बिहार में कैटफिश मिलने का यह पहला मामला नहीं है। इसके पहले मई 2021 में गंगा नदी में मिली थी। भागलपुर के कहलगांव में मछली मार रहे मछुआरे के जाल में यह मछली फंसी थी। अलग तरह की मछली फंसने पर मछुआरे उपेंद्र सहनी ने सबको बताया।

इसके बाद इसके फोटो तिलकामांझी भागलपुर विश्वविद्यालय (टीएमबीयू) पीजी जंतु विज्ञान विभाग के डॉ. डीएन चौधरी को दिखाया गया था। उन्होंने बताया कि वह कैटफिश है। उन्होंने कहा कि कैटफिश कई तरह के होते हैं। कहलगांव में मिली कैटफिश दरअसल एक्वेरियम फिश है। उसे आकर्षण के लिए लोग अपने घरों के एक्वेरियम में रखते हैं। वह मांसाहारी नहीं है।

एक्वेरियम शीशे पर जमने वाले काई और पानी में उत्पन्न जलीय पौधों को वे खाकर रहते हैं। उन्होंने बताया कि करीब एक साल पूर्व मुजफ्फरपुर में भी यह कैटफिश मिला था।

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By bihardelegation21

Chandan kumar patel (BA) , I am not social worker I am Social Media Worker.

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