औरंगाबादएक घंटा पहले

पेड़ के नीचे शिक्षा प्राप्त करने को मजबूर छात्र

औरंगाबाद के बर्डिह कला पंचायत के पिठनुआ में दो कमरे में तीन विद्यालय को चलाया जा रहा। जिले के राजकीय उत्क्रमित मध्य विद्यालय पिठनुआ में अपग्रेडेड उच्च विद्यालय, मध्य विद्यालय और नवसृजित प्राथमिक विद्यालय रामपुर में मात्र दो ही कमरे में स्कूल चल रहा। विद्यालय की स्थिति ऐसी है कि जगह के अभाव में बच्चों को पेड़ के छांव में पढ़ाया जा रहा। तीनों विद्यालयों में कुल 424 छात्र पर तीनों विद्यालयों से 11 शिक्षक वहां पदस्थापित है। इसमें प्राथमिक से मध्य विद्यालय तक 10 शिक्षक और उच्च विद्यालय में 1 शिक्षक जी अकेला नवम एवं दशम वर्ग के छात्रों को पढ़ाते है। इस विद्यालय में चार गांव के बच्चे पढ़ने आते है जिसमे पिठनुआ, बर्डिह कला, रामपुर और बांका बिगहा शामिल है।

प्राप्त जानकारी अनुसार वहां के विद्यालयों की स्थिति ऐसी है कि जगह के अभाव में बच्चों को बरगद, पीपल, पाकड़ के पेड़ के नीचे बैठाकर पढ़ाया जा रहा। इन बच्चों को पढ़ते देख पुरातत्व जमाने की बातें याद आ गयी जब कुटीर में शिष्यों को शिक्षा दी जाती थी। इस विद्यालय की कुल जगह छह डिसमिल है। जबकि नवसृजित प्राथमिक विद्यालय का अपना भवन नही है। सभी बच्चे उसी विद्यालय में पढ़ते है।

वहां की व्यवस्था की बात करें तो बच्चों के खड़े होने के लिए जगह नहीं है तो इतने सारे बच्चे बैठकर पढ़ेंगे कैसे ? जबकि स्टाफ को बैठने में काफी ज्यादा परेशानियां होती है। उस पूरे विद्यालय में शौचालय तो है लेकिन पूरी तरह से खराब है जिसमें शिक्षकों को भी काफी ज्यादा परेशानियां होती है जबकि बच्चे गांव के अगल-बगल शौचालय करने जाते हैं। विद्यालय में भोजनालय भवन नहीं है छात्रों को खाने के लिए भोजन गांव के ही एक निजी मकान में बनाया जाता है जिसमें रसोईया खाना पकाती है और बच्चे थाली में खाना लेकर इधर-उधर खुले में खाते हैं।

विद्यालय की स्थिति ऐसी है कि जगह के अभाव में बच्चों को बरगद, पीपल, पाकड़ के पेड़ के नीचे बैठाकर पढ़ाया जा रहा।

10वीं की स्मृति कुमारी ने बताया कि इंदु वर्ग के छात्रों को पढ़ने में सबसे ज्यादा परेशानी होती है। हम लोगों को बोर्ड की परीक्षा देना है, ऐसे में हमारी तैयारी कराने के लिए स्कूल में मात्र एक शिक्षक है। हम लोग पढ़ाई कैसे कर पाएंगे।

वहीं वर्ग सप्तम के गुड्डू कुमार और सूरज कुमार ने बताया कि बारिश के मौसम में सभी बच्चे एक जगह स्कूल में आकर खड़े हो जाते हैं फिर भी पूरी बच्चे इस दो कमरे में शामिल नहीं हो पाते। जबकि नवसृजित विद्यालय के बच्चे बारिश होने के कारण घर चले जाते हैं अगर घंटे 2 घंटे के बाद बारिश खुल ही जाती है तो विद्यालय खुला रहने के बावजूद भी बच्चे घर से फिर नहीं आ पाते हैं।बताते चलें कि हाई स्कूल के लिए एक भवन भी बनाया गया है लेकिन उसे संचालित नहीं किया गया है जबकि उस भवन की क्षेत्रफल लगभग 2 एकड़ है।

प्रधानाध्यापक प्रदीप कुमार ने बताया कि कई बार आपदा प्रबंधन को आवेदन भेज दिया गया है लेकिन स्थिति को देखते हुए लेकिन इस पर अभी तक पहल नहीं किया गया। किस तरीके से यहां पर बच्चों को पढ़ाया जाता है वह यहां के छात्र और शिक्षक ही जानते हैं। यहां पर बच्चों को बदबूदार जगहों में खुले में पढ़ाया जाता है जिसे आने जाने के लिए भी जगह भी नहीं है।

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By bihardelegation21

Chandan kumar patel (BA) , I am not social worker I am Social Media Worker.

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