पटनाएक घंटा पहले

26 जनवरी 2023 यानी आज भारत अपना 74वां गणतंत्र दिवस मना रहा है। 26 जनवरी 1950 यानी संविधान लागू होने से ठीक दो दिन पहले संविधान की मूल कॉपी विशेष विमान से पटना लाई गई थी। गणतंत्र दिवस पर पढ़िए इसके पीछे की संविधान से जुड़ा वो किस्सा…

यह वाकया 1950 का है। तब 79 साल के एक बुजुर्ग के लिए संविधान की मूल कॉपी को बिहार लाना पड़ा था। इसे खुद देश के तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद अपने साथ लेकर विशेष विमान से पटना पहुंचे थे। पटना एयरपोर्ट से वो सीधे छज्जुबाग स्थित सच्चिदानंद सिन्हा के आवास पहुंचे।

यहां उन्होंने पहले सिन्हा साहब के पैर छू कर आशीर्वाद लिए। इसके बाद राजेंद्र प्रसाद के सामने डॉ. सच्चिदानंद सिन्हा ने संविधान की मूल प्रति पर अपना हस्ताक्षर किया। यह हस्ताक्षर संविधान लागू होने से ठीक 2 दिन पहले 24 जनवरी 1950 को हुआ था।

डॉ. सच्चिदानंद सिन्हा की तस्वीर।

मूल प्रारूप तैयार करने में शामिल थे सच्चिदानंद सिन्हा

दरअसल, 389 सदस्यों ने 29 महीनों में भारत के संविधान का मूल प्रारूप तैयार किया था। इनमें 36 लोग बिहार के थे। एक नाम सच्चिदानंद सिन्हा का भी था, जो इस संविधान सभा के पहले अस्थाई अध्यक्ष भी थे। संविधान का प्रारूप तैयार होने के बाद इसमें सभी का हस्ताक्षर होना अनिवार्य था। उस दौरान सभी के हस्ताक्षर तो हो गए थे, लेकिन तबीयत खराब होने के कारण सिन्हा साहब बिहार में थे। तब उनका दिल्ली जा पाना मुश्किल था।

हस्ताक्षर के बाद हुई थी पार्टी

इसी वजह से संविधान की मूल कॉपी को विशेष विमान से डॉ. राजेंद्र प्रसाद पटना लेकर आए। यहां 24 जनवरी 1950 को सिन्हा साहब ने संविधान की मूल कॉपी पर अपना हस्ताक्षर किया। इसके बाद बिहार के कई बड़े गणमान्यों के लिए सिन्हा साहब के आवास पर एक कार्यक्रम आयोजित किया गया था। फिर 26 जनवरी 1950 को पूरे देश भर में भारत का अपना संविधान लागू हुआ था।

सिन्हा लाइब्रेरी भवन का शिलान्यास जेपी ने किया था।

सिन्हा लाइब्रेरी भवन का शिलान्यास जेपी ने किया था।

संविधान के निर्माण में समझिए सच्चिदानंद सिन्हा की भूमिका

बिहार के बक्सर जिले के मुरार गांव में जन्मे सिन्हा साहब संविधान सभा के पहले अस्थाई अध्यक्ष थे। संविधान सभा की पहली बैठक में कांग्रेस के तत्कालीन अध्यक्ष आचार्य जेबी कृपलानी ने सभा के अस्थाई अध्यक्ष के लिए डॉ. सच्चिदानंद सिन्हा के नाम का प्रस्ताव रखा था। तब दिल्ली के कंस्टिट्यूशन हॉल में आयोजित इस बैठक में देश भर से आए प्रतिनिधियों ने सर्वसम्मति से सिन्हा साहब को अस्थाई अध्यक्ष बनाए जाने के प्रस्ताव को स्वीकार किया था।

इस पद के लिए उनके नाम की औपचारिक घोषणा कर दी गई। लेकिन, लगातार गिरते सेहत के कारण वे इस जिम्मेदारी का निर्वहन करने में सक्षम नहीं रह सके। उनकी जगह बिहार के ही डॉ. राजेंद्र प्रसाद को संविधान सभा का अध्यक्ष बनाया गया।

बिहार को अलग राज्य बनाने में भी अहम भूमिका

संविधान सभा का अस्थाई अध्यक्ष चुने जाने को अपने जीवन का सर्वोच्च सम्मान बताने वाले सच्चिदानंद सिन्हा की भूमिका केवल यहीं तक सीमित नहीं है। बिहार को बंगाल से अलग करने में भी एक बड़ा योगदान उनका माना जाता है।

संविधान की कॉपी पर सच्चिदानंद सिन्हा के हस्ताक्षर।

संविधान की कॉपी पर सच्चिदानंद सिन्हा के हस्ताक्षर।

पत्नी की याद में पटना में बनवा दी लाइब्रेरी

डॉ. सच्चिदानंद सिन्हा एक वकील थे। लेकिन, इसके साथ संविधान के जानकार भी थे। बंगाल से बिहार के विभाजन में भी उन्होंने अहम भूमिका निभाई थी। सच्चिदानंद सिन्हा को किताबों से काफी प्रेम था। इसका अंदाजा इसी बात से लगा सकते हैं कि उन्होंने अपनी पत्नी की याद में पटना में लाइब्रेरी का ही निर्माण करवा दिया। उनकी दिवंगत पत्नी राधिका सिन्हा की याद में 1924 में बनी ‘सिन्हा लाइब्रेरी’ आज भी है।

इस लाइब्रेरी का उद्घाटन 1924 में बिहार और ओडिशा ( तब उड़ीसा) के गवर्नर हेनरी व्हीलर ने किया था। इस लाइब्रेरी की शुरुआत डॉ. सिन्हा की ओर से दी गई 10,000 किताबों से हुई थी। आज यहां 1 लाख से भी अधिक किताबें रखी गई हैं। यहां 1903 से लेकर अब तक के अखबारों का संग्रह तो मिलेगा ही, साथ ही यहां इनके पीडीएफ भी मिलेंगे।

पत्नी राधिका सिन्हा की याद में सिन्हा लाइब्रेरी बनवाई थी।

पत्नी राधिका सिन्हा की याद में सिन्हा लाइब्रेरी बनवाई थी।

आजादी आंदोलन के बड़े लीडर्स सिन्हा लाइब्रेरी में करते थे मीटिंग

एक ट्रस्ट की स्थापना कर उसे 10 मार्च 1926 को लाइब्रेरी के संचालन का जिम्मा सौंप गया। स्वतंत्रता की लड़ाई के दौरान बड़े-बड़े नेशनल लीडर्स यहां आया करते थे। कई महत्वपूर्ण मीटिंग भी यहां हुई हैं। 1955 में गवर्नमेंट ऑफ बिहार ने इसे अपने अंडर ले लिया। शुरुआत में 1980 तक लोग यहां रिसर्च करने आया करते थे।

18 साल की उम्र में चले गए थे इंग्लैंड

डॉ. सच्चिदानंद सिन्हा का जन्म 10 नवंबर 1871 को बक्सर के मुरार गांव में हुआ था। इनके पिता बख्शी शिव प्रसाद सिन्हा डुमरांव महाराज के मुख्य तहसीलदार थे। गांव में प्राथमिक शिक्षा पूरी करने के बाद सिन्हा महज 18 साल की उम्र में उच्च शिक्षा के लिए 1889 को इंग्लैंड चले गए।

तीन साल पढ़ाई पूरी करने के बाद 1893 में वे देश लौटे। इसके बाद इलाहाबाद हाइकोर्ट में इन्होंने 10 साल तक वकालत की। इसके अलावा इन्होंने इंडियन पीपुल्स और हिन्दुस्तान रिव्यू नामक समाचार पत्रों का कई वर्षों तक संपादन भी किया।

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By bihardelegation21

Chandan kumar patel (BA) , I am not social worker I am Social Media Worker.

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